तपागच्छाचार्य, अनेक प्राचीन तीर्थोद्धारक पूज्य गच्छाधिपति गुरुदेव *राजयशसूरीश्वरजी म.सा.* की प्रेरणादायी *जीवन गाथा*1 पूज्य गच्छाधिपति गुरुदेव राजयशसूरीश्वरजी महाराज साहेब का जन्म गुजरात के नडियाद शहर में वि• सं• 2001 चैत्र (वैशाख) कृष्णा 10 दि• 7 मई 1944 के पावन दिन हुआ। यह वही पावन दिन है, जिस दिन श्री सिमंधरस्वामीजी आदि 20 विहरमान परमात्मा का जन्म कल्याणक है I
गुरुदेव के सौभाग्यशाली माता-पिता का नाम सौभाग्यशाली धर्मप्रेमी दंपति श्रीमती सुभद्राबेन एवं श्रीमान जिनदासभाई शाह था I गुरुदेव बचपन से ही समझदार और शांत प्रकृति के थे I उनकी प्रारंभिक एवं प्राथमिक शिक्षा नडियाद में ही संपन्न हुई। इसके पश्चात उनका परिवार मुंबई स्थानांतरित हो गया और मुंबई के पायधुनी क्षेत्र में रहते हुए उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा जारी रखी।बचपन से ही गुरुदेव की बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण थी और उनके मन में जीवन को कुछ विशिष्ट बनाने की प्रबल आकांक्षा थी। उस समय उनके हृदय में एक दृढ़ संकल्प था—उन्हें वैज्ञानिक बनना था।
विज्ञान के प्रति उनकी विशेष रुचि थी और इसी उद्देश्य से उन्होंने मुंबई के साइंस कॉलेज में प्रवेश लेकर अपनी पढ़ाई प्रारंभ की।लेकिन नियति को उनके लिए इससे भी महान कोई मार्ग चुनना था।मुंबई में अध्ययन के दौरान उन्हें पूज्य दादागुरुदेव लब्धिसूरीश्वरजी महाराज साहेब एवं पूज्य विक्रमसूरीश्वरजी महाराज साहेब के दर्शन एवं सान्निध्य का अवसर प्राप्त हुआ। इन महान संतों का संपर्क उनके जीवन का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।गुरुदेव के जीवन में इन संतों की प्रेरणा का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उनके भीतर एक नई जागृति का उदय हुआ। जिस मन में अब तक वैज्ञानिक बनने का संकल्प था, उसी मन में धीरे-धीरे एक और महान संकल्प आकार लेने लगा—आत्मा को जानने का, आत्मा को पहचानने का और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलने का।विज्ञान उन्हें बाहरी जगत के रहस्यों को समझने की दिशा में ले जा रहा था, लेकिन गुरुदेव को संतों के सान्निध्य से यह अनुभूति हुई कि जीवन का सबसे बड़ा विज्ञान तो स्वयं को जानना है।और यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।उन्होंने वैज्ञानिक बनने के अपने संकल्प को पीछे छोड़कर आत्मज्ञानी बनने का संकल्प स्वीकार किया।
सांसारिक ज्ञान की खोज से उनकी यात्रा आत्मज्ञान की खोज की ओर मुड़ गई।एक ओर विज्ञान की प्रयोगशाला उनका इंतजार कर रही थी, तो दूसरी ओर अध्यात्म की प्रयोगशाला उन्हें पुकार रही थी।उन्होंने बाहरी संसार के रहस्यों को खोजने के बजाय अपने भीतर छिपे आत्मतत्त्व के रहस्य को जानने का मार्ग चुना।यही वह निर्णायक क्षण था, जिसने एक भावी वैज्ञानिक को आत्मज्ञान के साधक में और आगे चलकर एक महान शासनप्रभावक गुरुदेव में परिवर्तित कर दिया I
