गुरुभगवंतों की प्रेरणा और माता-पिता के मंगलमय आशीर्वाद से मुमुक्षु रमेशभाई ने मात्र 19 वर्ष की युवावस्था में, वि सं 2020 माघ ( फागन) कृष्णा 5 दि 2 फरवरी 1964 के दिन मुंबई के लालबाग में संयम जीवन स्वीकार किया और पूज्य आचार्यदेव विक्रमसूरीश्वरजी के शिष्य मुनि राजयशविजयजी के रूप में आत्मकल्याण की महान यात्रा का शुभारंभ किया।
संयम स्वीकार करते ही उनकी तीक्ष्ण बुद्धि, असाधारण स्मरणशक्ति और विचक्षण प्रतिभा का परिचय मिलने लगा। शास्त्रों, आगमों एवं जैन दर्शन के गंभीर अध्ययन में उन्होंने अत्यंत अल्प समय में उल्लेखनीय प्रगति प्राप्त की। ज्ञान के प्रति उनकी जिज्ञासा, अध्ययन के प्रति उनकी निष्ठा और विषय को गहराई से समझने की उनकी क्षमता ने उन्हें शीघ्र ही एक विलक्षण विद्वान साधु के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
इस ज्ञानयात्रा में उन्हें पूज्य गुरुदेव विक्रमसूरीश्वरजी महाराज साहेब, पूज्य गुरुदेव नवीनसूरीश्वरजी महाराज साहेब एवं पूज्य गुरुदेव जयंतसूरीश्वरजी महाराज साहेब—इन तीनों आचार्य भगवंतों की विशेष कृपा, मार्गदर्शन और वात्सल्य प्राप्त हुआ।
इन आचार्य भगवंतों की प्रेरणा से मुनि राजयशविजयजी ने अपनी बुद्धि और प्रतिभा का उपयोग केवल शास्त्राध्ययन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि धर्म, अध्यात्म और जिनशासन की प्रभावना के प्रत्येक क्षेत्र में उसका सार्थक सदुपयोग किया।
विशेष रूप से पूज्य गुरुदेव विक्रमसूरीश्वरजी महाराज साहेब की निश्रा में होने वाले प्रत्येक शासनप्रभावक कार्य में मुनि राजयशविजयजी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रहती थी। उनकी संगठन क्षमता, दूरदृष्टि, कार्यकुशलता और नेतृत्व प्रतिभा के कारण बड़े-बड़े धार्मिक आयोजनों में वे प्रमुख सूत्रधार के रूप में उभरकर सामने आए।
सिकंदराबाद से सम्मेतशिखरजी तीर्थ की महासंघयात्रा हो अथवा कलकत्ता से शत्रुंजय तीर्थ की विराट महासंघयात्रा—इन दोनों ऐतिहासिक संघयात्राओं में पूज्य गुरुदेव विक्रमसूरीश्वरजी महाराज साहेब की निश्रा में संपूर्ण यात्रा के सूत्रधार, प्रेरणादाता और मार्गदर्शक के रूप में मुनि राजयशविजयजी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
उनकी योग्यता, विद्वत्ता, संगठन-कौशल और शासनप्रभावना की अद्भुत क्षमता को देखकर पूज्य गुरुदेव विक्रमसूरीश्वरजी महाराज साहेब ने चेन्नई में उन्हें पंन्यास पद से अलंकृत किया।
समय का चक्र आगे बढ़ा। पूज्य गुरुदेव विक्रमसूरीश्वरजी महाराज साहेब के कालधर्म के पश्चात जिनशासन को एक ऐसे योग्य, प्रतिभाशाली और प्रभावशाली नेतृत्व की आवश्यकता थी, जो गुरुदेव की शासनप्रभावना की परंपरा को आगे बढ़ा सके।
पूज्य गुरुदेव नवीनसूरीश्वरजी महाराज साहेब ने मुनि राजयशविजयजी की विलक्षण योग्यता, ज्ञान, प्रतिभा, तप, संगठनशक्ति एवं शासनप्रभावक क्षमता को पहचानते हुए अहमदाबाद में उन्हें आचार्य पद प्रदान किया।
इस प्रकार मुनि राजयशविजयजी गुरुदेव विक्रमसूरीश्वरजी महाराज साहेब के प्रबल एवं योग्य उत्तराधिकारी के रूप में जिनशासन के सर्वोच्च त्रिपदीय पदों में से तृतीय पद—आचार्य पद पर आरूढ़ हुए।
यह केवल एक पद की प्राप्ति नहीं थी।
यह एक ऐसी प्रतिभा का सम्मान था, जिसने अपने जीवन की प्रत्येक क्षमता को आत्मकल्याण, गुरुभक्ति और जिनशासन की प्रभावना के लिए समर्पित कर दिया था।
19 वर्ष की उम्र में संयम से प्रारंभ हुई यह यात्रा—मुनि राजयशविजयजी से पंन्यास पद और पंन्यास पद से आचार्य पद तक पहुँची; और आगे चलकर यही तेजस्वी व्यक्तित्व जिनशासन में पूज्य गच्छाधिपति गुरुदेव के रूप में अपनी अमिट प्रभावना अंकित करने वाला बना।
